बुन्देलखंड का हर निवासी बुन्देला है


बुन्देलखंड में महाराजा छत्रसाल की शासन सत्ता इस प्रकार थी :–


इस जमना उत नर्मदा,इस चम्बल उत टौंस ।

छत्रसाल सौं लरन की,रही न काहू हौंस ।।







मंगलवार, 3 जून 2014

बुंदेलखंड संस्कृति


                                     




वैदिक तथा पुराणयुगीन बुन्देली समाज और संस्कृति
 
यदि यह मान लिया जाये कि द्रविड़ों के उन्नत काल में आर्यों का आक्रमण या आगमन हुआ था और इसी मे वृत्र ने इन्द्र का प्रतिरोध किया था तो निश्चित है इसमें ही वृत्रासुर हुआ होगा और उसके कारण इन्द्र का ब्रह्म हत्या का मार्गी बनाया जाना औचित्य पूर्ण सिद्ध होता है। द्विवेदी जी ने कहा है कि आर्यों ने भारत में बसने   से पूर्व यहाँ के तत्कालीन निवासियों की उस सभ्यता का ध्वंस किया जिसे सिंधु घाटी की सभ्यता का नाम दिया गया है जिसके प्रमुख केन्द्र मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा माने गए हैं।
       वैदिक संस्कृति सार्वदेशिक मानी जाती है। उस समय में बुंदेलखंड की कल्पना यमुना और नर्मदा के बीच के क्षेत्र से की जाती है जिस पर नागों और असुरों का ही आधिपत्य था। पौराणिक बुंदेलखंड को समझने के लिए एफ० आई० पार्जिटर के मत को मानना समीचीन होगा। उनके मतानुसार मूल पुराणों की रचना इसी काल में हुई जब वैदिक वाङ्मय ने अंतिम रुप धारण किया।
       त्रेतायुग तक विन्ध्य पृष्ठ में ॠषियों का वास हो गया था। वाल्मीकि स्वयं मध्यप्रदेश के थे। दशरथि राम इनके समकालीन थे। परशुराम के पश्चात् कातवीर्य अर्जुन के पौत्र तालजंघ के समय में हैदयों का उत्कर्ष फिर हुआ। तालजंघ के कई पुत्रों में से वितिहोत्र और कुंडिकेर विन्ध्याचल में (वर्तमान बुंदेलखंड में) फैली पर्वतमाला में रहै। श्री एन० एल० डे के मतानुसाल इस समय चेदि राज्य में सागर के समकालीन राजा विदर्भ के पुत्र कौशिक ने राज्य किया।
       वैदिक तथा उपनिशद युग में धर्म, राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं साहित्यिक दृष्टि से विकास हुआ। धर्म के क्षेत्र में इन्द्र, वरुण, सविता, अग्नि आदि अनेक देवताओं की स्तुति हुई। सभी देवों को समान स्तर पर माना गया। यज्ञों का आयोजन हुआ। यज्ञों में क्रमश: कर्म काण्ड का प्राधान्य आया। इसी समय प्राग्रवैदिक तथा आर्य धर्म साधना का समन्वय हुआ। आगे चलकर शिव, स्कन्द और यज्ञों की पूजा ने वैदिक धर्मों में मान्यता प्राप्त की तथा इसका कारण यह था कि नेतृत्व दोनों धाराओं का एक ही ब्राह्मण वर्ग में था।
       वैदिक काल के प्रारंभ में राज्य के संगठन की इकाई ग्राम था जिसमें अनेक कुल होते थे। वर्ण व्यवस्था का प्राधान्य हुआ। विभिन्न ॠषियों ने वैदिक संहिताओं की रचना की जिन्हें ॠग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद कहा गया। उनके अतिरिक्त ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, श्रौत एवं गृह सूत्र वैदिक साहित्य में तता वेदांगों में शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निवस्त, छन्दस् और ज्योतिष की रचनायें सामने आई। मूर्तिकला के संदर्भ में पं० द्विवेदी का मत समीचीन है कि वैदिक धर्म में अनन्तर विकास होने पर अमूर्त देवताओं का स्थान मूर्तिमान शिव, विष्णु आदि द्वारा ग्रहण किये जाने पर यूथ-स्तम्भें, यज्ञशालाओं के खम्भों दीवारों और वेदिकाओं पर इनकी मूर्तियों के पूर्व रुप इस काल के अन्तिम भाग में बनने लगे होंगे और लोक कर्म के यक्ष, नाग, कूर्म, मकर, वृष आदि भी सुविधाजनक वाहन, अलंकरण और मुख्य देवता की भाँति अपने युग की प्रवृतियों के अनुरुप निर्मित अराधना स्थलों में मूर्तिकला के अभिप्राय बने होंगे। धातुओं का प्रयोग और कृषि शिकार ही उनका जीवन संबल था। आर्यों के आगमन से उनकी संस्कृति, धर्म, सामाजिक स्थिती में अंतर आया, वे समन्वय में ही लगे रहे। आर्यों से उनमें कठोर जाति व्यवस्था का सूत्रपात हुआ। उनके देवता शिव, स्कन्द, कृष्ण आदि को व्यापक मान्यता मिली। बस्तियों का निर्माण, कलात्मक उन्नति आदि के पुन: कार्य हुए। वैदिक युग में सामाजिक जीवन के संबंध में दो मत हैं। एक में आदर्श रुप बनाया गया है और दूसरे को समाजशास्र के आधार पर कहा गया है। समाजशास्र के आधार पर प्राचीन वैदिक काल में जहां उदात्त का युग था, उत्तर वैदिक काल विस्तार विपल्व और अन्तर्द्वेन्द पूर्ण हुआ। कबीलाई संस्कृति क विकास जनपद में हुआ। जनपद भी अधिक समय तक न चले कालांतर में वे "राज्य' में बदले। ब्राह्मणों और क्षत्रियों के संघर्ष का परिणाम यह हुआ कि उपनिषदों के माध्यम से भारतीय दर्शन के ग्रंथ सामने आये। सामाजिक जीवन में विवाह, उत्तराधिकारी, धार्मिक, अनुष्ठानों, संस्कारों आदि के निश्चित विधान थे। वैदिक युग के बाद परस्री से, नियोग द्वारा संतति उत्पन्न करने जैसे नियमों को त्याग दिया गया। वैदिक युग में समाज में वर्ण व्यवस्था ने जोर पकड़। कर्मकाण्ड का प्राधान्य हुआ। इस समय बुंदेलखंड में पुलिन्द, दण्डक और दुछा शबर, विन्ध्यमालीय, कुरमी, निषाद, कोल आदि ऐसी जातियों का प्राधान्य था जो अभि तक आर्यों के साथ पूर्णत: समायोजित न हो पाये थे।
 

     गुफा -युग

प्राचिन ग्रंथों से मालूम होता है कि रामायण-काल तक बुंदेलखंड आर्येतर पुलिंदों, निषादों, शबरों, रामठों, दाँगियों आदि आदिवासियों का निवास-स्थान रहा है । इस कारण इस प्रदेश के लोकधर्म में इन वन्य जातियों की धार्मिक मान्यताओं का महत्त्वपूर्ण स्थान है । गुफा-युग में धर्म सामुदायिक था । उनके देवता आध्यात्मिक न होकर जागतिक थे । उनकी अर्चा का उद्देश्य बाधाओं और विपत्तियों से रक्षा और सांसारिक सुखों की प्राप्ति था । उपयोगिता ही देवत्व की कसौटी थी । इस कारण फल, माँस, जल, शरण, रोशनी देले वाले वृक्ष, पशु, नदी-सरोवर, गिरि, अग्नि आदि का अर्चन शुरु हुआ । साथ ही भय की भावना से सर्पादि जैसे घातक जंतुओं का भी । चमत्कारी और प्रभावशाली प्राकृतिक शक्तियों के प्रति आस्था भी जरुरी थी । सभी लोकदेवों की पूजा मानसिक थी । आधिकतर उन्हें, फल और माँस की भेंट दी जाती थी, जिसकी लीक बलि की रुढि में परिवर्तित हुई थी । आग जलाकर उसके चारों ओर घेरा बनाकर कुछ गाना और नाचना मानो अग्नि को प्रसन्न करना था । इसी तरह गुफाओं में अपने मन का कोई चित्र या आकृति बनाकर उसे रक्षा का प्रतीक मान लेना एवं उस पर पूरे समुदाय का विश्वास होना अंचल के देवता की पहली कल्पना थी । कई गुफाओं में ऐसे विचित्र मानवी चित्र मिले हैं, जो देवत्व की प्राचीनतम अवधारणा के प्रमाण लगते हैं ।
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कृषि-युग में नदी घाटी सभ्यता का उद्भव हुआ था । मैदान में पहले पशुपालन, फिर कृषि-कर्म की अवस्था आई और तदनुरुप लोक और लोकधर्म का विकास हुआ । पशुओं की रक्षा और अधिक लाभप्राप्ति की लोकभावना ने पशुपति और पशुओं की पूजा को जन्म दिया । इसी तरह कृषि-कर्म की उपयोगिता बढ़ाने और फसलों को अनेक विपत्तियों से बचाने के लिए जल, नदी तथा यक्षादि को देवत्व मिला । दोनों में प्रजनन और उत्पत्ति की वृद्धि हेतु मातृशक्ति की पूजा अनिवार्य हो गई । इस जनपद की आदिम जातियाँ-शबर और पुलिंद देवीभक्त थीं, जिसका प्रमाण प्राचीन ग्रंथों में मिलता है और जिससे स्पष्ट है कि मातृमूर्ति की पूजा यहाँ प्रधान थी ।-१ उसके साथ भूदेवी की पूजा भी प्रचलित हुई, जो आज तक भियाँ रानी या भुइयाँ रानी के रुप में वर्तमान है । एक कच्चे या पक्के चबूतरे पर एक छोटी-सी मढिया जिसमें कोई मूर्ति नहीं होती, भूदेवी का सबसे पुराना प्रतीक है, जो इस जनपद में आज भी अवशिष्ट है । जातकों और पुराणों में वर्णित भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और जादू-टोना भी इसी युग की देन हैं । इनसे धर्म के आनुष्ठानिक रुप के विकास का भी पता चलता है, लेकिन प्रामाणिक साक्ष्यों के अभाव में कुछ भी कहना उचित नहीं है ।

बुंदेलखंड गंधर्वों और नागों का संघर्ष

नर्मदा संबंधी एक उपाख्यान है, जिसमें गंधर्वों और नागों के संघर्ष का वर्णन है । पहले गंधर्वों ने मुनि कश्यप के छ: लाख पुत्रों को लेकर नागों को पराजित किया था और उनके मूल्यवान् रत्न छीनकर उनके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया था । बाद में नागों ने नर्मदा से पुरुकुत्स की सहायता लेने के लिए कहा, इस कारण नर्मदा पुरुकुत्स को लेकर पाताल गयी और पुरुकुत्स ने गंधर्वों का संहार किया । इस पर नागों ने नर्मदा को आशीर्वाद दिया कि 'जो कोई नर्मदा का स्मरण करेगा, उसे सर्पों से भय नहीं रहेगा ।' यह उपाख्यान चाहे ऐतिहासिक हो और नर्मदा के माध्यम से गंधर्व और नाग जातियों के संबंधों पर प्रकाश डालता हो, चाहे कल्पित हो और नर्मदा की महिमा स्थापित करने के लिए लिखा गया हो, लेकिन इतना निश्चित है कि इस कथा से एक लोकविश्वास का जन्म हो गया । लोगों का विश्वास है कि प्रात: और रात्रि में नर्मदा मैया को नमस्कार करने और यह प्रार्थना करने से कि 'हे नर्मदा ! मुझे सर्पों के विष से बचाओ', सर्पों का विष व्याप्त नहीं होता । होता यह है कि कथा विस्मृत हो जाती है, विश्वास अमर रहता है

बुंदेलखंड एक सांस्कृतिक परिचय

                         गिरि गहर नद - निर्झर मय लता गुल्म तरु कुंज भूमि है,
                               तपोभूमि साहित्य कलायुत वीर भूमि बुंदेल भूमि है ।
एक समय था, जब बुंदेलखंड का विस्तृत प्रदेश एक शासन-सूत्र में बंध कर उत्तर में यमुना से लेकर दक्षिण में नर्मदा तक और पश्चिम में चम्बल से लोकर पूर्व में टां... तक फैला हुआ था, किंतु इन नदियों द्वारा घिरे हुए भाग में सीमांत की ओर के क्षेत्र बघेली गोंडा, जयपुरी, मालवी, निमाड़ी, छत्तीसगढ़ी और गोंडी बोलियों का दबाव प्रभाव वाले हैं । बुंदेली बोली की दृष्टि से जो भाग वास्तविक बुंदेलखंड है, उसका आज कुछ भाग उत्तर-प्रदेश और शेष मध्यप्रदेश के कुछ भागां में विस्तार पाये हैं । इस प्रकार झांसी, हमीरपुर, बांदा, जालौन, सरीला, ग्वालियर, ईसागढ़, विदिशा, भोपाल, टीकमगढ़, छत्तरपुर, पन्ना, चरखारी, समथर, दतिया, विजावर, अ्जयगढ़ तथा सागर, दमोह, जबलपुर और होशंगाबाद इसमें सम्मिलित किये जाते हैं। सवनी का कुछ भाग भी इसके अंतर्गत लिया जाता है। राजनितिक सीमाओं की दृष्टि से विभिन्न ऐतिहासिक युगों में राज्यों के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों को लेकर विभिन्न दिशाओं में बढ़ाया-घटाया जा सकता है।
पुराकाल से अब तक बुंदेलखंड अनेक शासकों के अधीन रहा है इसलिए उसके नाम समय-समय पर बदलते रहे हैं - जैसे - पुराणकाल मे यह "चेदि' जनपद के नाम से अभिहित हुआ है तो साथ-साथ इसको दस नदियों वाला "दशार्ण' प्रदेश भी कहा गया है। विन्धय पर्वत की श्रेणियों से आवेष्टित होने के कारण इसे "विंधयभूमि' या "विंधय निलय', "विंधय पार्श्व' आदि संज्ञाऐं भी मिलती हैं। "चेदि' का दूसरा नाम "डाहल' माना जाता है दशार्ण और "चेदि' अलग-अलग जनपद भी हैं। चेदी और त्रिपुरी का सम्बंध भी महत्वपूर्ण माना जाता है। बुंदेलखंड की दक्षिणी सीमा रेवा (नर्मदा) के द्वारा बनती है इसलिऐ इसे "रेवा का उत्तर प्रदेश' भी माना जाता है। बुंदेलखंड में पुलिन्द जाति और शबरों का अनेक समय तक निवास रहा है इसलिए कतिपय विद्वान इसे "पुलिन्द प्रदेश' अथवा "शबर-क्षेत्र' भी घोषित करते हैं।
बुंदेलखंड राजनैतिक इतिहास में दसवीं शताब्दी के बाद ही अपनी संज्ञा को सार्थक करता है। चंदेली शासन मे यह क्षेत्र "जुझौती' के नाम से जाना जाता था किन्तु जव पंचम् सिंह बुंदेल के वंशजों ने पृथ्वीराज के खंगार सामन्त को कुण्डार में परास्त किया और इस प्रदेश पर अधिकार जमाया, इस भूमि का नाम बुंदेलखंड पड़ा ।
पंचम सिंह यूं तो स्वयं गहरवार थे । वे बुंदेला कब हुं, इस संबंध में अनेक विंवदन्तियाँ हैं । कतिपय विद्वानों का मत है कि यह शब्द विंध्यवासिनी देवी से संबंधित है । पंचम सिंह ने विंध्यवासिनी देवी की आराधना की थी । विंध्यवासिनी देवी का मंदिर विंध्य पर्वत श्रेणियों पर स्थित है, इसलिए कहा जाता है कि पंचम सिंह ने अ्पने नाम के साथ "विंध्येला' जोड़ लिया था । यह विंध्येला शब्द ही बाद में "बुंदेला' रुप में विकसित हो गया और जिस क्षेत्र में पंचम सिंह अथवा उसके वंशजों ने राज्य विस्तार वह बुंदेलखंड कहलाया । टाड के अनुसार ""जसौंदा   नामक गरहवार ने विंध्यवासिनी देवी के सम्मुख एक महायज्ञ करके अपने वंशजो को "बुंदेला' प्रसिद्ध किया और इससे बुंदेलखंड बना ।''
बुंदेलखंड के विभिन्न खंड एक लम्बे समय तक भिन्न-भिन्न शासकों के बंधन मे रहे इसलिए विभिन्न भागों के बुंदेलखंडियों में एकता के बीच किंचित विधिता का आभास मिलता है, फिर भी बुंदेलखंड के विभिन्न भाग मिला कर अपनी प्राकृतिक रचना, जलवायु और भाषा तथा साहित्य रीति-नीति और लोक-व्यवहार मे ऐसा खंड है, जिसका एक विशेष अपनापन है।

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

"भले पधारे जूँ "





इस जमना उत नर्मदा, इस चम्बल उत टौंस ।
छत्रसाल सौं लरन की, रही न काहू हौंस ।।

 

उमा भारती जी के मुताबिक बुंदेलखंड अरसे से उपेक्षित है और इस क्षेत्र पर सपा, कांग्रेस, बसपा पैकेज की राजनीति करती रही हैं। लोगों की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति अलग राज्य के गठन से ही पूरी हो सकती हैं।

 इस क्षेत्र के लोग अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग लम्बे समय से करते आ रहे है. प्रस्तावित बुंदेलखंड राज्य में उ.प्र 






































































बुंदेलखंड एकीकृत परिषद  द्वारा प्रस्तावित बुंदेलखंड राज्य में कुछ जिले उत्तर प्रदेश के तथा कुछ मध्य प्रदेश के हैं,वर्तमान में बुंदेलखंड क्षेत्र की स्तिथि बहुत ही गंभीर है । यह क्षेत्र पर्याप्त आर्थिक संसाधनों से परिपूर्ण है किन्तु फिर भी यह अत्यंत पिछड़ा है । इसका मुख्य कारण है,राजनीतिक उदासीनता














चित्रकूट, औरछौ, कांलिजर, उन्नाव तीर्थ,!  
पन्ना, खजुराहो जहॅा कीर्ति झुकि झूठी है!!
जमुन,पहुज सिन्धु, बेतवा, धसान, केन!
मन्दाकिनी, पर्यास्वेनी, प्रेमपाय धूमी है!!
पंचम नृसिंह राव चंपतरा छत्रसाल,!
लाला हरदौल भाव-भाव चित चूमी है!!
अमर अनन्दनीय असुर निकन्दनीय!
वन्दनीय विश्व में बुन्देखण्ड भूमि है!!।



रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास, मुगल राजा अकबर से लोहान लेने वाली रानी दुर्गावती,  राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त,














अंग्रेज़ों को चुनौती देने वाली रानी लक्ष्मीबाई,

 हॉकी खिलाड़ी ध्यानचंद से

न जाने कितनी ऐतिहासिक शख़्सियतों ने बुंदेलखंड की धरती पर जन्म लिया

 


केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों का प्रतिनिधितित्व करने वाले कई वरिष्ठ नेतागण जब बुंदेलखंड आते हैं तो वहां की जनता के बीच में तो पृथक बुंदेलखंड राज्य की खुली वकालत करते है किंतु वापस आते ही इस मुद्दे को भूल जाते हैं। बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी का आरोप है कि गुमराह करने का ऐसा ही क्रम पिछले 50 सालों से चल रहा है । वर्ष 1955 में फजल अली की अध्यक्षता में गठित हुए राज्य पुनर्गठन आयोग की पुरजोर शिफारिश के बावजूद आज तक बुंदेलखंड राज्य का गठन सम्भव नही हो सका।



परदेसी पक्षियों का सर्दी आशियाना बुंदेलखंड का रनगढ़ किला

  बुंदेलखंड में दुर्लभ प्रजाति के रंग-बिरंगे पक्षी 

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परदेसी पक्षियों के लिए महफूज नहीं रहा बुंदेलखंड
बांदा| घाटियों में ज्यों-ज्यों सर्दी बढ़ रही है, त्यों-त्यों सैकड़ों दुर्लभ प्रजाति के पक्षी बुंदेलखंड के नदी-पोखरों को अपना आशियाना बनाते जा रहे हैं। लेकिन इन परदेसी मेहमानों का गोश्त खाने के शौकीन शिकारियों ने उनका बेधड़क शिकार करना शुरू कर दिया है और इस पर अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं।
सर्दी का आगाज होते ही हर साल बुंदेलखंड के नदी-पोखरों को विभिन्न देशों से हजारों की तादाद में आए दुर्लभ प्रजाति के रंग-बिरंगे पक्षी अपना आशियाना बनाना शुरू कर देते हैं, जिनमें हंस, साइबेरियन काज, सेहली, नकटा, लाल सिर वाली काज जैसे 'परदेसी मेहमान' प्रमुख हैं।

एक समय था, जब इन परदेसी मेहमानों के किलोरियों के बीच लोग जल विहार का लुफ्त उठाया करते थे, लेकिन अब इनका गोश्त खाने के शौकीन शिकारी अधिकारियों की रहस्यमय चुप्पी के बीच दिन-रात इनका शिकार करते हैं। हर साल अधिकारी महज चेतावनी जारी कर अपने कर्तव्य से विमुख जाते हैं।

 परदेसी पक्षियों का सर्दी आशियाना   बुंदेलखंड का रनगढ़ किला 

मध्य प्रदेश की सीमा और केन नदी की तलहटी में बसे गांव गौर-शिवपुर के रहने वाले रमेश यादव बताते हैं, "केन नदी में रनगढ़ किले के इर्द-गिर्द सैकड़ों की तादाद में हंस और साइबेरियन काज तैरते हैं, एक समुदाय विशेष के शिकारी दिन में नाव के जरिए और रात में किले में छिप कर इनका शिकार कर रहे हैं।"

उन्होंने बताया कि चूंकि रनगढ़ किला केन नदी के बीचोंबीच बना हुआ है, इसलिए शिकारी शाम से ही बंदूकों के साथ छिप जाते हैं और जैसे ही पक्षी किले के पास आते हैं, शिकारियों की बंदूकें गरज पड़ती हैं। रमेश की मानें तो रोजाना 10-20 परदेसी पक्षी मारे जा रहे हैं।

नदी-पोखरों और बांधों में रात बसनेर करने वाले प्रवासी पक्षी पेट भरने की गरज से तड़के धान कटे खेतों में झुंड बनाकर दाना चुनते हैं, वहां मेड़ और अरहर की घनी फसल की आड़ में शिकारी इनका शिकार कर रहे हैं। बांदा जिले के तेन्दुरा गांव के ग्रामीण चुन्नू ने बताया, "उनके डेरा से कुछ दूर के खेत में शुक्रवार तड़के पड़ोसी गांव के ग्राम प्रधान के पति ने अपने साथियों के साथ पांच पक्षियों का शिकार किया है, पुलिस में शिकायत करने पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।"

बांदा में तैनात अपर पुलिस अधीक्षक स्वामी प्रसाद का कहना है, "इन पक्षियों के बसनेर करने वाले नदी-तालाबों में पुलिस गश्त बढ़ाई जा रही है, साथ ही शिकारियों को चिन्हित कर कड़ी कार्रवाई भी होगी।"

बुंदेलखंड में हर साल की तरह इन परदेसी मेहमानों का बड़े पैमाने पर शिकार एक बार फिर शुरू हो गया है और जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ रस्म अदायगी कर रहे हैं, ऐसी स्थिति में यह कहना गलत न होगा कि परदेसी मेहमानों के लिए यह इलाका महफूज नहीं रहा।

Sorce:बांदा से रामलाल जयन की रिपोर्ट 
Published by: Vineet Verma
Published on: Sat, 23 Nov 2013 at 05:31 IST

धन्य धरा बुंदेलखंड की जहां झलकारी ने जन्म लओ.

महोबा, कार्यालय प्रतिनिधि : संत कबीर आश्रम में रविवार को वीरांगना झलकारी बाई की जयंती मनाई गई। इस दौरान आयोजित काव्य गोष्ठी में लोगों ने अपनी रचनाओं की पेशकश की।

महाविद्यालय के प्रवक्ता डा. एलसी अनुरागी व समाजसेवी शिवकुमार गोस्वामी ने झलकारी बाई के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डाला। इसके बाद पं जगप्रसाद तिवारी व मालती विश्वकर्मा ने धन्य धरा बुंदेलखंड की जहां झलकारी ने जन्म लओ..तो राजकीय बालिका इंटर कालेज की शिक्षिका सरगम खरे ने सुनो-सुनो ए दुनिया वालों झलकारी की अमर कहानी..पंक्तियों के माध्यम से मौजूद लोगों को मंत्र मुग्ध कर दिया। मनोज मधुर ने ले लिया जन्म मारी किलकारी थी..रचना की प्रस्तुति कर जमकर वाहवाही लूटी। कवि हरदयाल हरि, पालिकाध्यक्ष पुष्पा अनुरागी व योगेंद्र अनुरागी आदि ने भी अपने विचार व रचनाएं प्रस्तुत की। इस मौके पर राजकुमार अनुरागी, जगदीश चंद्र, किशोरदादा पुरवार सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।

बुंदेलखंड क्षेत्र में क़ाग़ज़ पर योजनाएं

विकास की कलई खोलते बुंदेलखंड के आदिवासी

रविवार, 24 नवंबर, 2013 को 13:06 IST


बुंदेलखंड की धरती कई मायने में बेहद अहम रही है लेकिन आज यह इलाक़ा बदहाली और पिछड़ेपन की मिसाल बन गया है.
रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास, मुगल राजा अकबर से लोहान लेने वाली रानी दुर्गावती, अंग्रेज़ों को चुनौती देने वाली रानी लक्ष्मीबाई, राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त, हॉकी खिलाड़ी ध्यानचंद से लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता उमा भारती तक न जाने कितनी ऐतिहासिक शख़्सियतों ने बुंदेलखंड की धरती पर जन्म लिया.
लेकिन अब यह इलाक़ा अपने पिछड़ेपन की वजह से ही सुर्ख़ियों में होता है. बुंदेलखंड का इलाक़ा उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश दोनों राज्यों में पड़ता है. उत्तरप्रदेश के सात ज़िले और मध्यप्रदेश के छह ज़िले इसमें आते हैं. मध्यप्रदेश में टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दामोह, दतिया, और सागर ज़िले आते हैं.
टीकमगढ़ ज़िला मुख्यालय से सिर्फ़ आठ किलोमीटर के फ़ासले पर बसे आदिवासी गांव कांटी जाने के बाद प्रदेश के चौतरफ़ा विकास के तमाम दावे खोखले नज़र आने लगते हैं. 24 साल के मोहन आठवीं तक पढ़ाई करने के बाद ग़रीबी के कारण पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो गए.
बीबीसी से बातचीत के दौरान मोहन कहते हैं कि उनके पास कोई काम नहीं है. सरकार ने भी कुछ नहीं किया. उनके पास ग़रीबी की पहचान करने वाली बीपीएल कार्ड भी नहीं है. कारण पूछने पर उन्होंने कहा कि पंचायत सचिव ने एक हज़ार रुपए की रिश्वत मांगी जो ज़ाहिर है उनके पास नहीं थे जिसे देकर वो अपना बीपीएल कार्ड बनवा सकें.

कोई परियोजना नहीं

मोहन
आदिवासी गांव कांटी के मोहन का कहना है कि उनके पास बीपीएल कार्ड भी नहीं है
मोहन के पास ही खड़ी दर्जनों महिलाएं भी अपनी ग़रीबी और पिछड़ेपन का दुखड़ा सुनाती हैं. लेकिन ये कहानी सिर्फ़ एक मोहन या कांटी गांव की नहीं है, बुंदेलखंड के कई इलाक़ों में हालात कमोबेश एक जैसे हैं. कई गांवों में लोग घास की रोटी खाने के लिए मजबूर हैं.
टीकमगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र अधवर्यु कहते हैं कि बुंदेलखंड का विकास न तो दिग्विजय सिंह के दस साल के कार्यकाल में हुआ और न शिवराज सिंह के समय में हुआ. उनके अनुसार इन इलाक़ों में न कोई सिंचाई परियोजना शुरू हुई, न कोई उद्योग आया, न कोई बिजली संयंत्र लगा.
राजेंद्र अधवर्यु कहते हैं कि बुंदेलखंड के पूरे इलाके में कृषि प्रधान ज़िले हैं लेकिन कोई एग्रोइंडस्ट्री यहां पर नहीं लगाई गई.
टीकमगढ़ के जाने-माने वकील मानवेंद्र सिंह कहते हैं कि भौगोलिक संरचना के कारण आवागमन की दिक़्क़तें, सामंती मानसिकता और आज़ादी के बाद चुने गए जनप्रतिनिधियों में विकास को लेकर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, ये तीन इस इलाक़े के पिछड़ेपन के प्रमुख कारण हैं.
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने 2009 में बुंदेलखंड के विकास के लिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार से विशेष पैकेज की मंज़ूरी के लिए गुहार लगाई थी जिसे सरकार ने फ़ौरन स्वीकार करते हुए दोनों राज्यों के बुंदेलखंड क्षेत्र के विकास के लिए लगभग सात हज़ार करोड़ के विशेष पैकेज की घोषणा कर दी.

क़ाग़ज़ पर योजनाएं


विशेष पैकेज का लाभ बुंदेलखंड के लोगों को नहीं मिल सका है
तो आख़िर इन पैसों का क्या हुआ? राजेंद्र अधवर्यु कहते हैं कि विशेष पैकेज का सारा पैसा अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने हड़प कर लिया और योजनाएं सिर्फ़ क़ागज़ों पर ही लागू की गईं.
भ्रष्टाचार की बात तो एडवोकेट मानवेंद्र भी स्वीकार करते हैं लेकिन यहां के लोगों पर भी हमला करते हुए मानवेंद्र सिंह कहते हैं, "यहां की जनता में आगे बढ़ने की ललक में कहीं न कहीं कमी रही. जो है जैसा है उसे पाकर संतुष्ट रहना यहां के जनमानस की आदत बन गई है."
मानवेंद्र सिंह कहते हैं कि बुंदेलखंड विशेष पैकेज से यहां का विकास संभव नहीं है, जब तक की यहां कोई स्थायी रोज़गार न दिए जाए और जब तक बुनियादी ढांचा तैयार न हो. यहां बेहतरीन क़िस्म का खनिज पाया जाता है जिनका दोहन बाहर के लोग कर रहे हैं लेकिन बुंदेलखंड का जनमानस उसका उपयोग नहीं कर पाया.
चार साल पहले राहुल गांधी ने यहां की ग़रीबी, यहां का पलायन और यहां की भूखमरी को देखने के बाद इन इलाक़ों के लिए विशेष पैकेज की मांग की थी. राजेंद्र अधवर्यु कहते हैं कि विशेष पैकेज का लाभ बुंदेलखंड के लोगों को नहीं मिल सका.
अलग-अलग लोगों की राय अलग हो सकती है लेकिन इलाक़े का दौरा करने के बाद इसमें शायद कोई शक नहीं कि शिवराज सिंह चौहान के विकास के दावों की सारी क़लई बुंदेलखंड में खुल जाती है.
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